कविता

लिखती हूँ एक ख़त.....तुम्हारे नाम

Dec
31

लिखती हूँ एक ख़त.....तुम्हारे नाम

आज सुबह देखा है एक ख्वाब,
तुम हो उदास, आँखें है पुरआब,
दुआएं करते हो मेरे लिए, देते हो मुझे श्रद्धांजलि,
मेरी अम्मा को समझाते हुए, मेरे अब्बा को देते तसल्ली,

मैं सिर्फ उनकी बेटी नहीं, इस कायनात की बेटी हूँ,
मैं सिर्फ एक सिमटी हुई आवाज़ नहीं, तुम्हारे सीनों में परवाज़ करती हुई गूँज हूँ मैं...
मेरे होंटो पे तबस्सुम अब ढूंढना न तुम,
सुर्ख आखों की वहशत में कहीं हो गयी हूँ गुम,
नाज़ुक कलाईयों को, मुस्कुराहटों को, शोखियों को,
दहशत के सौदागरों ने खून से रंग दिया है........

निकली थी घर से बे-सरो-सामां,

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देर ना हो जाये

Apr
27

न जाने कौन सा दर्द
कहाँ से उठ आये |
अपनों के बीच में अपने ही
अजनबी बन जाए |
प्यार क्या है और
ज़िन्दगी समझ न आये |
इससे पहले कि
दोनों से विश्वाश उठ जाए
ज़िन्दगी हस्ते -हस्ते जी जाए,
गुल, गुलशन, गुलफाम की जाए |
बहुत मुश्किल है
प्यार को पाना और निभाना
ज़िन्दगी को अपने ढ़ग से
जी पाना |
इससे पहले कि श्रद्धा और विश्वाश -
से दिल टूट जाए |
प्यार भरे रिश्ते में घुन लग जाए,
ज़िन्दगी को अपनी गुल, गुलशन, गुलफाम बनाया जाए |

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हमला जारी है

Jun
09

अद्रश्य शत्रुओं का हम पर ,
भारत माता के आनन पर ,
गुप -चुप हमला जारी है |
आहत दुश्मन की सुनते है ,
मंडराते रिपु के साये है |
पुरु.प्रथ्वीराज और चन्द्रगुप्त
हतप्रभ से खड़े पहरुए है |
भारत माता के आंगन पर,
इस पंचशील के उपवन पर |
गुप-चुप नित हमला जारी है |
हो सावधान षड्यन्त्रो का,
यह काला बादल मंडराता |
माता का आंचल खींच रहा ,
आँखों का काजल चुरा रहा |
गांधी, गुरुनानक गौतम पर,
अपने भारत के जन जन पर |
गुप-चुप हमला जारी है |
संस्कृतियों को खंडित करता ,
संस्कारो को दुषित करता |
कर्जो में हमको लाद रहा ,

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याद तुम्हारी आई

Feb
25

जब जब व्यथित हुआ मेरा मन ,
याद तुम्हारी आई |
प्रथम बार ही देख तुम्हे मै -
तो अपना मन हारा |
लगा सोचने जैसे जीने -
का मिल गया सहारा ||

मेरे अंतर्मन की देखी ,
कब तुमने गहराई |
साथ -साथ रहकर भी कितनी ,
हम दोनों में दुरी |
मिले नित्य पर कब हो पाई ,
साथ मिलन की पूरी | |

जब जब चाहा कह दूँ मन की ,
वाणी कब कह पाई |
पाकर तुम्हे कहाँ यह जाना ,
क्या होता है पाना |
तुमने की अपनी मनमानी ,
कहना कभी न मन | |

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बसंत

Feb
25

सरसों पीली फूली जाय ,
उर की अमराई बौराय ,
यौवन अचरा नहीं समाय ,
कोई प्रियतम आये , यह नगरी बसाये |

नये नये सपनों की दुनिया सजीली ,
जानूँ न किसकी ये आशा छबीली ,
कामना करू नयन बस जाय |

उर की अमराई बौराय ,
यौवन अचरा नहीं समाय ,
कोई प्रियतम आये , यह नगरी बसाये |

संगी सहेली सब बनी है पहेली ,
गोदी में ललना ले खेली हमजोली ,
देखकर मनवा बहुत लुभाय ,

उर की अमराई बौराय ,
यौवन अचरा नहीं समाय ,
कोई प्रियतम आये , यह नगरी बसाये |

कैसे कहु बाबा से मुझे लाज आये ,
हाथ करो पीले यह अंगना न भये |

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दिल

Dec
06

चलो दिल कों माफ कर देते है
फिर एक बार दिल से बात कर लेते है |
माना दिल हमको दर्द पहुचायेगा -
आखिरी बार दिल की बात रख लेते है |

एंजिल

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मेरा प्यार

Sep
29

मानते थे दिल जिसे ,
वो कहीं है खो गया ;
प्यार था मेरा वही,
जो किसी का हो गया |

हम तड़प के रह गए,
दूर खुद से हो गए ;
कि प्यास है बढ़ी हुई ,
घाट दूर हो गए |

कि जिंदगी का नद कहीं,
हो मगन चला गया
प्यार था मेरा वही ,
जो किसी का हो गया ;

शुष्क रेत छोड़ कर ,
तट सभी छोड़ कर ;
छाँव नई खोज ली ,
रुख कहीं को मोड़ ली ;

भावना को भूल कर ,
खोजना सिखा गया ;
प्यार था मेरा वहीं ,

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इश्क इबादत है

Sep
29

'मंजुल ' महबूब मेरा कितना खुबसूरत है ;;
उसके चेहरे पर अजब नूर है चाहत है ;;
बस मुहब्बत ही है उसकी नजरो में ऐ खुदा ;
मजहबे-इश्क में उसकी अजब शरीयत है ;;

याद करती हु उसे है यही बन्दगी मेरी
इश्क ही मेरे लिए सबसे बड़ी इबादत है ;
बस ज़रा सी छेड़-शरारत से रूठ जाता है ;
तुनुक मिजाजी में सीमाब सी आदत है; ;

गुनाह कहता है वो हाथ तलक भी छूने को ;
क्या अर्ज करे ऐ दिल? उसमे बड़ी शराफत है ;;
शाख्न्सिय्त है उसकी हजारो में एक ही 'मंजुल '
वो आदमी नही जैसा फरिश्ता सीरत है ;;

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सत्ता की भूख

Sep
29

ओं कर्णधारो ; तुम हुए आज इतने बोने ,
तुमको धरती का सारा बोझ उठाना था |
भरना था पेट तुम्हे इन भूखे बच्चो का,
तुमको तो सारा देश नही खा जाना था ||

तूफान उठाये हिन्दू मुस्लिम के मन में ,
क्यों आग लगा दी भारत से नन्दन वन में ,
जयचंद बन गए, मिलकर दुश्मन से जाकर ,
तुमको जन- सेवक सा कर्तव्य निभाना था | |

गाँधी को जल कर राख हुए बीते वर्षो ,
तो राख बेच खाई है तुमने कल परसों ,
तुम कोख खा गए अपनी माँ की ओं कायर ;
तुम को तो बिच्छु का तन लेकर आना था | |

कुर्सी के लोभी हाथ जोड़ कर क्या होगा ,

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दुश्मन को चाल नहीं चलने देंगे

Sep
29

जाति-पांत का भेद-भाव हम नही यहाँ बढ़ने देगे |
हिंसा की बलिवेदी अब निर्दोश नही चढने देगे |

सत्य अहिंसा के हम राही,
पंचशील के हामी है ,
मानव-सेवा धर्म हमारा ,
कर्मवाद अनुगामी है |

बहुत हो गया अब दुश्मन को चाल नहीं चलने देगे |
हिंसा की बलिवेदी, अब निर्दोष नही चढने देगे |

हमने अपना सब कुछ -
परहित की खातिर बलिदान किया |
सुख -वैभव की बाते छोडो ,
अस्थि जाल तक दान दिया |

भारत माता के है सुपूत हम मान नही घटने देगे |

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