कविता

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अंतर्मन

Sep
13

अपना शहर ही अजनबी लग रहा था,
इस बार कुछ अजीब लग रहा था।
साथ था रिश्तों का काफिला मगर,
गुलाल रंगहीन  अबीर सा लग रहा था।
तमाम शिकायते है रिश्तों से मगर,
उलझा था मन, वहीं जी लग रहा था।
बहुत रोये रिश्तों के रंग-ढ़ग देख कर,
बिछड़ा हुआ साथी, करीब लग रहा था।
कैसे भुलाऊँ वो गाली, शहर, आंगन,
जिसका हर कोना कोहिनूर लग रहा था।
क्या, क्यों, किससे कहे पूणिर्मा,
भरी थी महफिल दिल फकीर लग रहा था।

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वो इतना खरे हैं!

Sep
11

वो इतने खरे हैं,
समझ से परे हैं।
भीड़ मे खड़े हैं,
हर बात पर अड़े हैं।
सुनाया करे हैं,
सुना न करे हैं।
काहे का गुमान है,
लगे तो शैतान है।
बक-बक करे है,
शान्ति न धरे है।
समझाया करें है,
समझा न करें हैं।
ना समझे खुद को,
सबने समझाया करे है।
मुश्किल है जीना फिर भी,
जीना तो पड़े है।
     "अज्ञात"

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